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Wednesday, March 10, 2021

पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी अर्थात्‌ सफला एकादशी (Saphala Ekadashi Vrat)

पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी अर्थात्‌ सफला एकादशी -

सफला एकदशी पारंपरिक हिंदू कैलेंडर में 'पौष" माह/ महीने के दौरान कृष्ण पक्ष के 'एकदशी' (11 वें दिन) पर मनाया गया शुभ उपवास है। इस एकदाशी को 'पौष कृष्ण एकादशी' भी कहा जाता है। यदि आप ग्रेगोरीयन कैलेंडर का पालन करते हैं तो इसे दिसंबर से जनवरी के महीनों के बीच मनाया जाता है। सफला एकदशी का दिन हिंदुओं के लिए पवित्र है क्योंकि यह माना जाता है कि इस दिन ईमानदारी से उपवास करके भक्त अपने पापों को दूर कर सकते हैं और आनंदित जीवन का आनंद उठा सकते हैं। एकदशी एक श्रद्धेय और पवित्र दिन है जो हर चंद्र हिंदू माह में दो बार आती है और इस दिन विश्व के संरक्षक भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।


सफला एकादशी व्रत विधि

पद्म पुराण के अनुसार सफला एकादशी के दिन भगवान विष्णु का विधि- विधान के साथ पूजन किया जाता है। सफला एकादशी के दिन उपवास करना चाहिए। दीप, धूप, नारियल, फल, सुपारी, बिजौरा, नींबू, अनार, सुंदर आंवला, लौंग, बेर, आम आदि से भगवान श्रीहरि की आराधना करनी चाहिए। पद्म पुराण के अनुसार सफला एकादशी के दिन दीप दान करने का विशेष विधान है।

द्वादशी तिथि को पूजा करने बाद भगवान विष्णु की आरती कर भगवान को भोग लगाना चाहिए। भोग लगाने व प्रसाद वितरण के बाद ब्राह्मण को भोजन करना चाहिए। सफला एकादशी का व्रत अपने नाम के अनुसार फल देता है। हिन्दू धर्मानुसार इस व्रत के पुण्य से मनुष्य के सभी कार्य सफल होते हैं और उसके पाप खत्म हो जाते हैं।
सफला एकदशी का महत्व
सफला एकदशी का महत्व ‘ब्रह्मांडा पुराण' में धर्मराज युधिष्ठिर और भगवान कृष्ण के बीच बातचीत के रूप में वर्णित है। हिंदू ग्रंथों के मुताबिक यह कहा जाता है कि राजसूया यज्ञ और अश्वमेधि यज्ञ मिल कर भी इतना लाभ नहीं दे सकते, जितना सफला एकदशी का व्रत रख कर मिल सकता हैं। सफला एकदशी व्रत रखने से दुःखों की समाप्ति होती है और भगवत प्रेम बढता हैं। 

वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी/ ग्यारस अर्थात्‌ वरुथिनी एकादशी (Varuthini Ekadashi)

वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी अर्थात्‌ वरुथिनी एकादशी -

हिन्दू धर्म शास्त्रों में हर एक एकादशी का एक विशेष महत्त्व बताया गया है। इसी क्रम में वरुथिनी एकादशी को वरुथिनी ग्यारस नाम से भी जाना जाता है। पद्म पुराण के अनुसार वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरुथिनी एकादशी (Varuthini Ekadashi) कहा जाता है। हिन्दू धर्म में इस पुण्य व्रत को सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। 

वरुथिनी एकादशी व्रत विधि -

वरुथिनी एकादशी व्रत करने वाले व्यक्ति को व्रत से एक दिन पहले यानि दशमी के दिन कांस, उड़द, मसूर, चना, कोदो, शाक, मधु, किसी दूसरे का अन्न, दो बार भोजन तथा काम क्रिया, इन दस बातों का त्याग करना चाहिए।

एकादशी के दिन भगवान का पूजन कर भजन कीर्तन करना चाहिए। द्वादशी के दिन पूजन कर ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए। अतः दक्षिणा देकर विदा करने बाद स्वयं भोजन ग्रहण करना चाहिए। एकादशी के व्रत में सोना, पान खाना, दांतुन, दूसरे की बुराई, चुगली, चोरी, हिंसा, काम क्रिया, क्रोध तथा झूठ का त्याग करना चाहिए। 

वरुथिनी एकादशी व्रत का महत्त्व

पद्म पुराण के अनुसार वरुथिनी एकादशी व्रत से सुख का लाभ तथा पाप की हानि होती है। यह व्रत सभी भोग और मोक्ष प्रदान करता है। वरुथिनी एकादशी व्रत करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी अर्थात्‌ योगिनी एकादशी (Yogini Ekadashi Vrat)

योगिनी एकादशी व्रत (Yogini Ekadashi)

हिन्दू पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी कहा जाता है। इस शुभ दिन पर और पीपल के वृक्ष की पूजा का विधान विशेष है। पद्म पुराण के अनुसार योगिनी भगवान विष्णु एकादशी व्रत (Yogini Ekadashi Vrat) करने से साधक के सभी पापों का नाश होता है और मृत्यु के बाद मोक्ष प्राप्त करता है।

योगिनी एकादशी व्रत विधि (Yogini Ekadashi Vrat Vidhi in Hindi)

योगिनी एकादशी व्रत का महत्त्व सम्पूर्ण ब्रह्मांड में प्रसिद्ध है। इस व्रत को नियमपूर्वक करने से मनुष्य के सभी पापों का नाश हो जाता है तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है। योगिनी एकादशी व्रत करने वाले व्यक्ति को एक दिन पहले यानि दशमी के दिन से ही व्रत नियमों का पालन करना चाहिए। यह व्रत दशमी की रात से शुरू होकर द्वादशी की सुबह में पूजा व दान के बाद पूर्ण होता है।

योगिनी एकादशी वाले दिन स्नानादि के बाद, व्रत संकल्प लिया जाता है। स्नान के लिए मिट्टी या तिल के लेप का प्रयोग करना शुभ माना जाता है। स्नान के बाद कुम्भ स्थापित करने का विधान है, जिसके ऊपर भगवान विष्णु की मूर्ति रखकर धूप, दीप आदि से पूजा करनी चाहिए। योगिनी एकादशी व्रत की रात में भगवान विष्णु का जागरण करना चाहिए। पारण यानि द्वादशी के दिन पूजन के बाद ब्राह्मण को भोजन और दान देकर विदा करने के बाद भोजन ग्रहण करना चाहिए।


योगिनी एकादशी व्रत का महत्त्व (Importance of Yogini Ekadashi Vrat in Hindi)

पद्म पुराण के अनुसार योगिनी एकादशी व्रत करने से अट्ठासी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर का फल मिलता है। जो व्यक्ति इस व्रत को नियम- पूर्वक पूर्ण करता है, उसे श्रेष्ठ फल मिलता है। योगिनी एकादशी व्रत कथा सुनने से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है और भगवान विष्णु का धाम प्राप्त करता है।

पुरुषोत्तमी मास की एकादशी व्रत विधि (Purushottam Ekadashi Vrat)

पुरुषोत्तमी मास की एकादशी व्रत विधि -

पुरुषोत्तम मास की एकादशी अधिक माह में मनाई जाती है और यह एकादशी अधिक माह के कृष्ण पक्ष में आती है जिसे पुरुषोत्तम मास की एकादशी कहा जाता है। जो महीना अधिक हो जाता है उसपर पुरुषोत्तम मास की एकादशी का व्रत निर्भर करता है, इसलिए पुरुषोत्तम मास की एकादशी का व्रत रखने के लिए कोई चंद्र मास तय नहीं होता। अधिक मास को मलमास/ पुरषोत्तम मास भी कहते हैं। इसे अधिक मास की या पुरुषोत्तम मास की एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

पुरुषोत्तम एकादशी का महत्व

अधिक मास भगवान विष्णु का एक प्रिय महीना है। इस महीने में एकादशी का व्रत करने से हजारों यज्ञ के समान फल मिलता है। साथ ही मृत्यु के पश्चात मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके अलावा यह व्रत मनोरथ पूर्ती के लिए भी शुभ माना गया है। इस बात की मान्यता है कि जो भक्त भगवान विष्णु की असीम कृपा पाना चाहते हैं, उन्हें पुरुषोत्तम एकादशी का व्रत करना चाहिए।

पुरुषोत्तम एकादशी पूजा विधि –

दशमी के दिन एकादशी के व्रत्त का संकल्प ले और एकादशी के दिन प्रात: काल स्नान आदिसे निवृत होकर भगवान विष्णु का ध्यान व प्रार्थना करें। सबसे पहले भगवान विष्णु की मूर्ती या तस्वीर को पीले कपड़े पर बिछाकर स्थापित करें। फिर मूर्ती पर गंगाजल छिड़कें और रोल या अक्षत का तिलक लगाएं। सफेद फूल चढ़ाएं। फिर भगवान को भोग लगाएं और तुलसी का पत्ता भी अर्पित करें। इसके बाद भगवान के स्रोत या मंत्रों का जाप करें और विष्णु चालीसा का पाठ करें। फिर देसी घी का दीपक जलाएं और जाने अनजाने हुए पापों की क्षमायाचना करके आरती उतारें। ब्रह्मनो ब्रह्मणो व जरूरमंदों को दान करें और शाम के समय भी पूजा अवश्य करें। रात में विष्णु भगवान का भजन कीर्तन करें और द्वादशी तिथि को स्नान के बाद भगवान का स्मरण करें और ब्रह्मणो को खाना करवाकर दक्षिणा के साथ विदा करें।

फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी की व्रत कथा तथा विधि (Vijaya Ekadashi Vrat Katha)

फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी की व्रत कथा तथा विधि -

धर्मराज युधिष्‍ठिर बोले - हे जनार्दन! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है तथा उसकी विधि क्या है? कृपा करके आप मुझे बताइए।

श्री भगवान बोले हे राजन् - फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम विजया एकादशी है। इसके व्रत के प्रभाव से मनुष्‍य को विजय प्राप्त‍ होती है। यह सब व्रतों से उत्तम व्रत है। इस विजया एकादशी के महात्म्य के श्रवण व पठन से समस्त पाप नाश को प्राप्त हो जाते हैं। एक समय देवर्षि नारदजी ने जगत् पिता ब्रह्माजी से कहा महाराज! आप मुझसे फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी विधान कहिए।

ब्रह्माजी कहने लगे कि हे नारद! विजया एकादशी का व्रत पुराने तथा नए पापों को नाश करने वाला है। इस विजया एकादशी की विधि मैंने आज तक किसी से भी नहीं कही। यह समस्त मनुष्यों को विजय प्रदान करती है। त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्रजी को जब चौदह वर्ष का वनवास हो गया, तब वे श्री लक्ष्मण तथा सीताजी ‍सहित पंचवटी में निवास करने लगे। वहाँ पर दुष्ट रावण ने जब सीताजी का हरण ‍किया तब इस समाचार से श्री रामचंद्रजी तथा लक्ष्मण अत्यंत व्याकुल हुए और सीताजी की खोज में चल दिए।

घूमते-घूमते जब वे मरणासन्न जटायु के पास पहुँचे तो जटायु उन्हें सीताजी का वृत्तांत सुनाकर स्वर्गलोक चला गया। कुछ आगे जाकर उनकी सुग्रीव से मित्रता हुई और बाली का वध किया। हनुमानजी ने लंका में जाकर सीताजी का पता लगाया और उनसे श्री रामचंद्रजी और सुग्रीव की‍ मित्रता का वर्णन किया। वहाँ से लौटकर हनुमानजी ने भगवान राम के पास आकर सब समाचार कहे।

श्री रामचंद्रजी ने वानर सेना सहित सुग्रीव की सम्पत्ति से लंका को प्रस्थान किया। जब श्री रामचंद्रजी समुद्र से किनारे पहुँचे तब उन्होंने मगरमच्छ आदि से युक्त उस अगाध समुद्र को देखकर लक्ष्मणजी से कहा कि इस समुद्र को हम किस प्रकार से पार करेंगे।

श्री लक्ष्मण ने कहा हे पुराण पुरुषोत्तम, आप आदिपुरुष हैं, सब कुछ जानते हैं। यहाँ से आधा योजन दूर पर कुमारी द्वीप में वकदालभ्य नाम के मुनि रहते हैं। उन्होंने अनेक ब्रह्मा देखे हैं, आप उनके पास जाकर इसका उपाय पूछिए। लक्ष्मणजी के इस प्रकार के वचन सुनकर श्री रामचंद्रजी वकदालभ्य ऋषि के पास गए और उनको प्रमाण करके बैठ गए।

मुनि ने भी उनको मनुष्य रूप धारण किए हुए पुराण पुरुषोत्तम समझकर उनसे पूछा कि हे राम! आपका आना कैसे हुआ? रामचंद्रजी कहने लगे कि हे ऋषे! मैं अपनी सेना ‍सहित यहाँ आया हूँ और राक्षसों को जीतने के लिए लंका जा रहा हूँ। आप कृपा करके समुद्र पार करने का कोई उपाय बतलाइए। मैं इसी कारण आपके पास आया हूँ

वकदालभ्य ऋषि बोले कि हे राम! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का उत्तम व्रत करने से निश्चय ही आपकी विजय होगी, साथ ही आप समुद्र भी अवश्य पार कर लेंगे।

इस व्रत की विधि यह है कि दशमी के दिन स्वर्ण, चाँदी, ताँबा या मिट्‍टी का एक घड़ा बनाएँ। उस घड़े को जल से भरकर तथा पाँच पल्लव रख वेदिका पर स्थापित करें। उस घड़े के नीचे सतनजा और ऊपर जौ रखें। उस पर श्रीनारायण भगवान की स्वर्ण की मूर्ति स्थापित करें। एका‍दशी के दिन स्नानादि से निवृत्त होकर धूप, दीप, नैवेद्य, नारियल आदि से भगवान की पूजा करें।

तत्पश्चात घड़े के सामने बैठकर दिन व्यतीत करें ‍और रात्रि को भी उसी प्रकार बैठे रहकर जागरण करें। द्वादशी के दिन नित्य नियम से निवृत्त होकर उस घड़े को ब्राह्मण को दे दें। हे राम! यदि तुम भी इस व्रत को सेनापतियों सहित करोगे तो तुम्हारी विजय अवश्य होगी। श्री रामचंद्रजी ने ऋषि के कथनानुसार इस व्रत को किया और इसके प्रभाव से दैत्यों पर विजय पाई।

अत: हे राजन्! जो कोई मनुष्य विधिपूर्वक इस व्रत को करेगा, दोनों लोकों में उसकी अवश्य विजय होगी। श्री ब्रह्माजी ने नारदजी से कहा था कि हे पुत्र! जो कोई इस व्रत के महात्म्य को पढ़ता या सुनता है, उसको वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

(Source - https://dharm.raftaar.in/festival/vrat-katha/vijaya-ekadashi-vrat-katha-in-hindi)

Friday, February 19, 2021

अहंकार और अभिमान अन्य अशुद्धियों को कैसे जन्म देते हैं

अहंकार और अभिमान अन्य अशुद्धियों को कैसे जन्म देते हैं

हमारे पुराणों में लिखी गई कहानियां हमें हमारे कार्यों और हमारे कार्यों के परिणामों के बारे में शिक्षित करने के लिए हैं। श्री नारद जी हिमालय क्षेत्र में तपस्या कर रहे थे और जब कामदेव ने उन्हें परेशान करने की कोशिश की, तो वे असफल हो गए क्योंकि हिमालय क्षेत्र भगवान शिव के प्रभाव में है लेकिन नारद जी ने सोचा कि यह उनका प्रभाव है, जिसने कामदेव को हरा दिया। यही नहीं, नारद जी को अभिमान हो गया कि भगवान शिव ने कामदेव को राख कर दिया, लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया है, और वे शांत रहे कामदेव पर कोई गुस्सा नहीं दिखाया। वह खुद को इतना गौरवान्वित महसूस कर रहा थे कि उसने सोचा कि मैं यह जानकारी भगवान शिव से व्यक्तिगत रूप से साझा करूं और अपनी उपलब्धि बताऊं। जब भगवान शिव ने ये सुना, तो वह मुस्कुराये और समझ गए कि नारद जी झूठे प्रभाव में हैं, और उन्होंने सलाह दी कि उसे भगवान विष्णु के साथ ये बात साझा नहीं करनी चाहिए। लेकिन नारद जी ने इस बात को नहीं समझ पाये, और भगवान विष्णु को बताने के लिए क्षीरसागर चले गए।

चूंकि भगवान शिव और भगवान विष्णु के बीच कोई अंतर नहीं है, भगवान विष्णु ने जान लिया कि नारद जी को अहंकार दोष हो गया हैं, चूंकि भगवान विष्णु अपने भगतो से बहुत स्नेह करते हैं और कोई भी दोष उनमे रहने नही देते, उन्होंने इस दोष को भी दूर करने का सोचा ताकि वह सबक समझें कि इस दुनिया में सब कुछ ईश्वर रचित हैं। इस दुनिया में जो कुछ भी होता है वह प्रभु की शक्ति के कारण होता है। जैसे हम सूर्य की शक्ति में चीजों को देखते हैं।

लेकिन नारद जी अहंकार के प्रभाव में थे। भगवान विष्णु ने सब कुछ नारद जी द्वारा बताने पर कुछ नही कहा, लेकिन मुस्कुरा दिए। नारद जी को लगा कि वह अब सभी प्राणियों से ऊपर हैं क्योंकि उन्होंने कामदेव को हरा दिया है। नारद जी भगवान विष्णु से मिलने के बाद अपनी दिनचर्या की सैर पर चल दिये। उन्हें अपने रास्ते पर एक सुंदर शहर दिखाई दिया। भगवान विष्णु की माया शुरू हो गई थी।

वह शहर बहुत सुंदर था, नारद जी सुंदरता से प्रभावित हो गये औरअंदर चले गये, राजा नारद जी से मिल कर अति प्रसन्न हुआ। राजा ने नारद जी का स्वागत किया और उनसे अनुरोध किया कि वह उनकी बेटी का हाथ देखकर उनके भविष्य की भविष्यवाणी करें। नारद चूंकि अहंकार के प्रभाव में थे, और एक दोष दूसरे को आमंत्रित करता है। वह इच्छाओं के कुएं में गिर जाता है। नारद जी पहले नगर कि सुंदरता मे, फिर राजा के वैभव और फिर राजा की बेटी देख कर, मोह माया के चक्र मे फंस गये। राजा की बेटी को देखने के बाद, नारद जी ने सोचा कि वह उनकी पत्नी होनी चाहिए। उसने उसका हाथ देखा और पाया कि इस लड़की का पति पृथ्वी का राजा होगा। वो ये भूल गये कि जगत्पति दीनानाथ ही इस धरा के स्वामी है। परन्तु राजा को अपनी दिल की बात ना कह सके, उन्होने कहा कि लड़की बहुत अधिक भाग्यशाली है। यह सुनकर राजा खुश हुआ। उन्होंने अपनी बेटी के लिए स्वयंवर करने का फैसला किया ताकि वह अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति को चुन सकें। नारद जी अपनी शादी के बारे में राजा के सामने नहीं बोल सकते थे क्योंकि वे संत की पोशाक में थे। नारद जी ने भगवान विष्णु से मिलने का फैसला किया और क्षीरसागर चले गए।

भगवान विष्णु जानते थे कि नारद जी इतनी जल्दी वापस क्यों आए हैं। नारद जी ने भगवान विष्णु से अनुरोध किया, क्योंकि वे इस पूरे ब्रह्मांड में सबसे सुंदर हैं, की आप अपना "हरी" रुप उन्हे प्रदान कर दे, ताकि वह राजा की बेटी से शादी कर सकें।

कामनासे सजगता, चेतनता आती नहीं, प्रत्युत ढक जाती है और बेहोशी आती है । जबतक कामना रहती है, तबतक असली बात समझमें नहीं आती । नारदजीके द्वारा वर माँगनेपर भगवान्‌ने कहा‒ कुपथ माग रुज व्याकुल रोगी । वैद न देइ सुनहु मुनि जोगी ॥ एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ । कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ ॥ (मानस, बाल॰ १३३ । १)

भगवान ने कहा की जिस प्रकार वैध रोगी के विना विचारे कुपथ (रोग मे हनिकारक‌) मांगने पर भी दवा ही देता हैं, मैं भी उसी विधि से तुम्हारा हित जिस मे होगा, वो मैं अवश्य करुंगा.

परन्तु कामनाके कारण नारदजी भगवान्‌की स्पष्‍ट वाणीको भी समझ नहीं सके । जिसके मुखमें नमककी डली रखी हुई है, वह मिश्रीको नहीं समझ सकता । भीतरमें संसारकी सत्ता, महत्ता और अपनापन पकड़ा हुआ है, इसलिये पारमार्थिक बात समझमें नहीं आती ।

भगवान विष्णु नारद जी को "हरि" जैसा चेहरा मांगने पर "हरि" मुख होने का वरदान देते हैं। नारद जी यह भूल गए कि हरि शब्द का एक और अर्थ है, वह है वानर, इसलिए नारद जी जब स्वयं को देखते हैं तो उन्हें भगवान विष्णु का चेहरा दिखता है और जब अन्य देखते हैं, तो उन्हें बंदर का चेहरा दिखाई देता है।

इसलिए, स्वयंवर के दौरान, जब राजा की बेटी ने उन्हे वानर जान कर नहीं चुना, तो वह आश्चर्यचकित हो गये । अचानक, उन्होने देखा कि भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर वहाँ पहुँचे और राजा की बेटी ने भगवान विष्णु के गले में माला डाल दी । भगवान विष्णु उन्हे अपने साथ ले कर गरुड जी पर स्वार हो अंतर्ध्यान हो गये। नारद जी को आश्चर्य हुआ, तब वहाँ उपस्थित उस स्वयंवर में आये दो गंधर्वो के उपहास से (कुछ जगह अन्य बाते भी पढने और सुनने मे आती है, नारद जी को वानर मुख का सच पता चलने के बारे मे) अपने वानर मुख का पता चला। अब जब नारद जी को सच्चाई समझ में आई तो वे बहुत क्रोधित हुए। वो क्षीरसागर की ओर चल दिये, लेकिन भगवान विष्णु पूरी स्थिति जानते थे, वे नारद जी को आधे रास्ते में ही मिल गये, साथ मे राजकुमारी गरुड जी पर श्री रुप मे विराजमान थी।

नारद जी गुस्से में अंधे थे और भगवान विष्णु से अपमानजनक शब्द कहने लगे और उन्हें श्राप दिया कि वह भी पत्नी को खोने का वैसा ही दर्द महसूस करेंगे, जैसा वह अब महसूस कर रहे हैं। नारद जी यह भूल गये कि यह पूरी बात कैसे शुरू हुई, जब वे स्वयं भगवान शिव के सामने दावा कर रहे थे कि उन्होंने सभी इच्छाओं पर विजय प्राप्त की और बिना क्रोध खोए कामदेव को हरा दिया, और अब खुद कामनाओ मे फंस कर श्राप दे रहे हैं ।

लेकिन चूँकि यह भगवान विष्णु का पूरा खेल था, और नारद जी ने भगवान विष्णु की इच्छा के अनुसार काम किया, हम सभी को इसे समझना चाहिए और कार्य करने मे सावधान और होने मे प्रस्न रहना चाहिए। भगवान विष्णु अपने भगत नारद जी को सबक सिखाना चाहते थे कि इस संसार में क्रोध और इच्छाओं से हमेशा लोगों का अपमान होता है, चाहे वह संत हो, देवता हो या मानव।

जिस समय नारद जी का मोह भंग हो गया था और नारद जी ने विष्णु जी को श्राप देने के बाद अपने पाप का प्रायश्चित करने का उपाय पूछा तो विष्णु जी ने नारद जी को काशी में जाकर कौन से शिव स्तोत्र का जप करने को कहा था ?

(1)शिव तांडव स्तोत्र

(2)शिव शतनाम स्तोत्र

(3)शिव सहस्त्रनाम स्तोत्र

(4)शिव पंचाक्षर स्तोत्र

(5)नील रुद्र शुक्त

🌹 इसका सही उत्तर है शिव शतनाम स्तोत्र 🌹

यह सब देखकर नारद जी की बुद्धि भी शांत और शुद्ध हो गई ।

उन्हें सारी बीती बातें ध्यान में आ गयीं । तब मुनि अत्यंत भयभीत होकर भगवान विष्णु के चरणों में गिर पड़े और प्रार्थना करने लगे कि- भगवन ! मेरा शाप मिथ्या हो जाये और मेरे पापों कि अब सीमा नहीं रही , क्योंकि मैंने आपको अनेक दुर्वचन कहे ।

इस पर भगवान विष्णु ने कहा कि -

जपहु जाइ संकर सत नामा। होइहि हृदयँ तुरत विश्रामाँ ।।

कोउ नहीं सिव समान प्रिय मोरें। असि परतीति तजहु जनि भोरें ।।

जेहि पर कृपा न करहि पुरारी। सो न पाव मुनि भगति हमारी ।।

विष्णु जी ने कहा नारद जी आप जाकर शिवजी के शिवशतनाम का जप कीजिये , इससे आपके हृदय में तुरंत शांति होगी । इससे आपके दोष-पाप मिट जायँगे और पूर्ण ज्ञान-वैराग्य तथा भक्ति-की राशि सदा के लिए आपके हृदय में स्थित हो जायगी । शिवजी मेरे सर्वाधिक प्रिय हैं , यह विश्वास भूलकर भी न छोड़ना । वे जिस पर कृपा नहीं करते उसे मेरी भक्ति प्राप्त नहीं होती।

यह प्रसंग मानस तथा शिवपुराण के रूद्रसंहिता के सृष्टि - खंड में प्रायः यथावत आया है । इस पर प्रायः लोग शंका करते हैं अथवा अधिकतर लोगों को पता नहीं होता है कि वह शिवशतनाम कौन सा है, जिसका नारद जी ने जप किया ,जिससे उन्हें परम कल्याणमयी शांति की प्राप्ति हुई ?

यहां सभी लोगों के लाभ हेतु वह शिवशतनाम मूल रूप में दिया जा रहा है । इस शिवशतनाम का उपदेश साक्षात् नारायण ने पार्वतीजी को भी दिया था , जिससे उन्हें भगवान शंकर पतिरूपमें प्राप्त हुए थे और वह उनकी साक्षात् अर्धांगनी बन गयीं।

।। शिव अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम् ।।

जय शम्भो विभो रुद्र स्वयम्भो जय शङ्कर ।

जयेश्वर जयेशान जय सर्वज्ञ कामद ॥ १॥

नीलकण्ठ जय श्रीद श्रीकण्ठ जय धूर्जटे ।

अष्टमूर्तेऽनन्तमूर्ते महामूर्ते जयानघ ॥ २॥

जय पापहरानङ्गनिःसङ्गाभङ्गनाशन ।

जय त्वं त्रिदशाधार त्रिलोकेश त्रिलोचन ॥ ३॥

जय त्वं त्रिपथाधार त्रिमार्ग त्रिभिरूर्जित ।

त्रिपुरारे त्रिधामूर्ते जयैकत्रिजटात्मक ॥ ४॥

शशिशेखर शूलेश पशुपाल शिवाप्रिय ।

शिवात्मक शिव श्रीद सुहृच्छ्रीशतनो जय ॥ ५॥

सर्व सर्वेश भूतेश गिरिश त्वं गिरीश्वर ।

जयोग्ररूप मीमेश भव भर्ग जय प्रभो ॥ ६॥

जय दक्षाध्वरध्वंसिन्नन्धकध्वंसकारक ।

रुण्डमालिन् कपालिंस्थं भुजङ्गाजिनभूषण ॥ ७॥

दिगम्बर दिशां नाथ व्योमकश चिताम्पते ।

जयाधार निराधार भस्माधार धराधर ॥ ८॥

देवदेव महादेव देवतेशादिदैवत ।

वह्निवीर्य जय स्थाणो जयायोनिजसम्भव ॥ ९॥

भव शर्व महाकाल भस्माङ्ग सर्पभूषण ।

त्र्यम्बक स्थपते वाचाम्पते भो जगताम्पते ॥ १०॥

शिपिविष्ट विरूपाक्ष जय लिङ्ग वृषध्वज ।

नीललोहित पिङ्गाक्ष जय खट्वाङ्गमण्डन ॥ ११॥

कृत्तिवास अहिर्बुध्न्य मृडानीश जटाम्बुभृत् ।

जगद्भ्रातर्जगन्मातर्जगत्तात जगद्गुरो ॥ १२॥

पञ्चवक्त्र महावक्त्र कालवक्त्र गजास्यभृत् ।

दशबाहो महाबाहो महावीर्य महाबल ॥ १३॥

अघोरघोरवक्त्र त्वं सद्योजात उमापते ।

सदानन्द महानन्द नन्दमूर्ते जयेश्वर ॥ १४॥

एवमष्टोत्तरशतं नाम्नां देवकृतं तु ये ।

शम्भोर्भक्त्या स्मरन्तीह शृण्वन्ति च पठन्ति च ॥ १५॥

न तापास्त्रिविधास्तेषां न शोको न रुजादयः ।

ग्रहगोचरपीडा च तेषां क्वापि न विद्यते ॥ १६॥

श्रीः प्रज्ञाऽऽरोग्यमायुष्यं सौभाग्यं भाग्यमुन्नतिम् ।

विद्या धर्मे मतिः शम्भोर्भक्तिस्तेषां न संशयः ॥ १७॥

इति श्रीस्कन्दपुराणे सह्याद्रिखण्डे

शिवाष्टोत्तरनामशतकस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

🌹 भोले बाबा के 108 नाम 🌹

भगवान शिव शतनाम-नामावली स्तोत्रम्!

ॐ शिवाय नमः ॥

ॐ महेश्वराय नमः ॥

ॐ शंभवे नमः ॥

ॐ पिनाकिने नमः ॥

ॐ शशिशेखराय नमः ॥

ॐ वामदेवाय नमः ॥

ॐ विरूपाक्षाय नमः ॥

ॐ कपर्दिने नमः ॥

ॐ नीललोहिताय नमः ॥

ॐ शंकराय नमः ॥ १० ॥

ॐ शूलपाणये नमः ॥

ॐ खट्वांगिने नमः ॥

ॐ विष्णुवल्लभाय नमः ॥

ॐ शिपिविष्टाय नमः ॥

ॐ अंबिकानाथाय नमः ॥

ॐ श्रीकंठाय नमः ॥

ॐ भक्तवत्सलाय नमः ॥

ॐ भवाय नमः ॥

ॐ शर्वाय नमः ॥

ॐ त्रिलोकेशाय नमः ॥ २० ॥

ॐ शितिकंठाय नमः ॥

ॐ शिवाप्रियाय नमः ॥

ॐ उग्राय नमः ॥

ॐ कपालिने नमः ॥

ॐ कौमारये नमः ॥

ॐ अंधकासुर सूदनाय नमः ॥

ॐ गंगाधराय नमः ॥

ॐ ललाटाक्षाय नमः ॥

ॐ कालकालाय नमः ॥

ॐ कृपानिधये नमः ॥ ३० ॥

ॐ भीमाय नमः ॥

ॐ परशुहस्ताय नमः ॥

ॐ मृगपाणये नमः ॥

ॐ जटाधराय नमः ॥

ॐ क्तेलासवासिने नमः ॥

ॐ कवचिने नमः ॥

ॐ कठोराय नमः ॥

ॐ त्रिपुरांतकाय नमः ॥

ॐ वृषांकाय नमः ॥

ॐ वृषभारूढाय नमः ॥ ४० ॥

ॐ भस्मोद्धूलित विग्रहाय नमः ॥

ॐ सामप्रियाय नमः ॥

ॐ स्वरमयाय नमः ॥

ॐ त्रयीमूर्तये नमः ॥

ॐ अनीश्वराय नमः ॥

ॐ सर्वज्ञाय नमः ॥

ॐ परमात्मने नमः ॥

ॐ सोमसूर्याग्नि लोचनाय नमः ॥

ॐ हविषे नमः ॥

ॐ यज्ञमयाय नमः ॥ ५० ॥

ॐ सोमाय नमः ॥

ॐ पंचवक्त्राय नमः ॥

ॐ सदाशिवाय नमः ॥

ॐ विश्वेश्वराय नमः ॥

ॐ वीरभद्राय नमः ॥

ॐ गणनाथाय नमः ॥

ॐ प्रजापतये नमः ॥

ॐ हिरण्यरेतसे नमः ॥

ॐ दुर्धर्षाय नमः ॥

ॐ गिरीशाय नमः ॥ ६० ॥

ॐ गिरिशाय नमः ॥

ॐ अनघाय नमः ॥

ॐ भुजंग भूषणाय नमः ॥

ॐ भर्गाय नमः ॥

ॐ गिरिधन्वने नमः ॥

ॐ गिरिप्रियाय नमः ॥

ॐ कृत्तिवाससे नमः ॥

ॐ पुरारातये नमः ॥

ॐ भगवते नमः ॥

ॐ प्रमधाधिपाय नमः ॥ ७० ॥

ॐ मृत्युंजयाय नमः ॥

ॐ सूक्ष्मतनवे नमः ॥

ॐ जगद्व्यापिने नमः ॥

ॐ जगद्गुरवे नमः ॥

ॐ व्योमकेशाय नमः ॥

ॐ महासेन जनकाय नमः ॥

ॐ चारुविक्रमाय नमः ॥

ॐ रुद्राय नमः ॥

ॐ भूतपतये नमः ॥

ॐ स्थाणवे नमः ॥ ८० ॥

ॐ अहिर्भुथ्न्याय नमः ॥

ॐ दिगंबराय नमः ॥

ॐ अष्टमूर्तये नमः ॥

ॐ अनेकात्मने नमः ॥

ॐ स्वात्त्विकाय नमः ॥

ॐ शुद्धविग्रहाय नमः ॥

ॐ शाश्वताय नमः ॥

ॐ खंडपरशवे नमः ॥

ॐ अजाय नमः ॥

ॐ पाशविमोचकाय नमः ॥ ९० ॥

ॐ मृडाय नमः ॥

ॐ पशुपतये नमः ॥

ॐ देवाय नमः ॥

ॐ महादेवाय नमः ॥

ॐ अव्ययाय नमः ॥

ॐ हरये नमः ॥

ॐ पूषदंतभिदे नमः ॥

ॐ अव्यग्राय नमः ॥

ॐ दक्षाध्वरहराय नमः ॥

ॐ हराय नमः ॥ १०० ॥

ॐ भगनेत्रभिदे नमः ॥

ॐ अव्यक्ताय नमः ॥

ॐ सहस्राक्षाय नमः ॥

ॐ सहस्रपादे नमः ॥

ॐ अपपर्गप्रदाय नमः ॥

ॐ अनंताय नमः ॥

ॐ तारकाय नमः ॥

ॐ परमेश्वराय नमः ॥ १०८ ॥

🙏🏼 हर हर महादेव जी 🙏🏼